Saturday, July 18, 2015

-.- आवारगी -.-

  


दरख्तों से गिरते हुए
सूखे पत्तों का
कोई ठिकाना नहीं होता
कोई अपना
कोई बेगाना नहीं होता
हमने भी सीख ली होती
तुझ से
तेरी मक्कारियां गर
तू मेरे दोस्त
मुझ से यूँ खपा नहीं होता
जी ले ज़िन्दगी को
फकीरों की तरह मुसाफिर
मांग ले चाहे
जितनी मन्नतें
यहाँ कोई
किसी का नहीं होता
ज़िन्दगी से
ना कर दिल्लगी
ये जाने कब किसको
दगा दे जाये
आजकल मौत का
कोई बहाना नहीं होता
तू ग़ालिब नहीं
तू मीर नहीं
की तुझको ज़माना
तेरे बाद याद रखे
चंद कलाम
पढने लिखने से
ज़माना किसी का
दीवाना नहीं होता
ना दर की
ना रहगुजर की
ना हमसफ़र की
बंदिशों में
तू मुझ को बाँध
अब मेरी आवारगी
मुझ से एक जगह
ज्यादा दिन गुजारा नहीं होता !

--- सुदेश भट्ट ---

Saturday, August 31, 2013

तस्वीर

     

तेरे शानों पे बिखरे
घने गेसुओं से ये शाम के अंधेरे हैं
आफताब है तू
तेरे नूर से रोशन ये सवेरे हैं
करो मेरा यकीं दिलनशीं
चुराए सारे रंग
तितलियों ने तेरी तस्वीर से हैं
निकला न करो
बेपरवाह चमन में
ये बागों में खिले फूल
तेरी खुशबू के लुटेरे हैं
सुने थे बचपन में
कहानियों में
परियों के किस्से
देखा तुमको
तो आज मालूम हुआ
वो सारे तेरे ही रूप के चरचे हैं
रहे तू और तेरी तिशनगी
मेरे दिल में बाकि
तेरी आँखों की बात कुछ और है
यूँ तो डूबने को समन्दर बहुतेरे हैं 



----  सुदेश भट्ट  ----



Wednesday, March 16, 2011

सबब

वजूद मेरा टूट कर
ज़र्रा ज़र्रा रेत की तरह बिखर गया
जो था ख़ुशी का सबब
जहाँ भर का गम वही दिल में भर गया
न आई रास मुझको
कुछ अपनों की मेहरबानियाँ
गेरों को भी कुछ
मेरा मुस्कराना शायद अखर गया
ज़ख़्म रिसते रहे
खामोशियाँ सिसकती रही
वो मेरा फिक्रमंद
हमदम जाने किधर गया
दुनिया से कर दिया था
मुझको जिसने बेगाना
वो जूनून
बरसात के दरिया सा धीरे धीरे उतर गया !


-----सुदेश भट्ट ------

Friday, March 11, 2011

दुनिया

दुनिया तेरी
इनायतों से दिल अब मेरा भर गया
मै जिंदा हूँ
मगर मेरे अन्दर का इंसान मर गया
आया था
बड़ी ति॰शनगी लेकर मै सेहराँ से
देख कर
खारापन समन्दर का 
प्यासा ही गुज़र गया
अच्छा हुआ
जो बेअदब ये दिल टूट गया
चलो इस बहाने से
तहज़ीब ए गमे इश्क तो सीख गया !


-----सुदेश भट्ट -----

Friday, March 4, 2011

कारोबार

कर के फ़ना मेरी हस्ती को
तू जाने तुझको क्या मिला
हम तो कारोबार
छुपा के सबकी नज़रों से
अश्कों का अब करते है
खो के तुझे ढूंडा तो
तू कुछ और मुकम्मल
मुझ में ही मिला
सोचा था करेंगेभूले से भी याद तुझे
देखो ये गुनाह भी अब हम करते है
ताउम्र चुभते है
दिल में खंजर की तरह कुछ रिश्ते
अपनों के दिए ज़ख्मौं कोकोई भी दवा कहाँ फिर भरती हैं
जिन दरख्तों को बेवक्त ही
रास आ जाए मौसम पतझड़ का 
उनकी सूखी शाखौं को फिर  
बहार भी आ कर  
कहाँ हरा करती है

-----सुदेश भट्ट -----

Wednesday, March 2, 2011

इंसान



कुछ देर से सही
चेहरे पे तुम्हारे भी
एक चेहरा चस्पा निकला
आसान नहीं फ़रिश्ता बनना
इंसानों सा आखिर
तुम्हारी भी फितरत का 
किस्सा निकला
मतलब से बाबस्ता
इंसान का इंसान से रिश्ता
क्या फर्क पड़ता है
तू सच्चा है या झूठा
अपनी अपनी राय है
अपना अपना मुद्दा
हम कैसे और क्यों अब
तुम्हारे मेहरम होते
हम ठहरे इंसान और तुम
कहते हो अपने को   ख़ुदा !



-----सुदेश भट्ट ------

Saturday, February 26, 2011

क्यों

दिल की ये बेचेनियाँ
अनबुझी सी ये
जिंदगी की पहेलियाँ
उलझी उलझी सी
हर उलझन
खुद से ही 
ये रोज़ की अनबन
बेतरतीब सा 
क्यों हो गया है
छोड़ के सलीका 
ये मेरा मन


-----सुदेश भट्ट ------

Tuesday, February 1, 2011

तुम

       तुम

दिल से की हुई 
इबादत सी हो तुम 
प्यार से लिखी हुई 
इक इबारत सी हो तुम
बड़े जतन से हांसिल हुई
कोई महारत सी हो तुम
सबकी नज़र बचा के 

अदा से की गई 
एक शरारत सी हो तुम
गुनगुनाये हर पल
जिनको दिल बेख्याली में 

ऐसे तरानों सी हो तुम
बचपन के छोटे छोटे  
मासूम बहानों सी हो तुम
नशेमन तुम्हारी दो आँखे 
छलकते हुए पैमानों सी हो तुम
हर रोज़ लगे
जिसमे ये दुनिया नई  

ऐसे जादुई आईने सी हो तुम
अलग अलग सबके लिए ज़िन्दगी के
खूबसूरत मायनों सी हो तुम
सर्द रात के बाद 

उगते सूरज की तपन सी हो तुम 
दूर हो मगर
नज़र को नसीब हो
रातों को चाँद से चकोर की 

लगन सी हो तुम!
---सुदेश भट्ट ---

Wednesday, November 10, 2010

दर्द

दर्द को पी गया

देके खुद को फरेब

देख मैं फिर

मुगालतों में जी गया

आह निकली तो थी

दिल से मेरे

गौर तलब है

की मेरे खुदा

तू अनसुना कर गया

आखरी मेरी ख्वाहिशों में

था तेरा नाम

ये अलग बात है

आखरी वक़्त में

अपने होंठो को मैं सी गया

रजिशों में भी तेरी

थी कोई बात

की मैं तुझको

खेर मकदम अपना कह गया

--सुदेश भट्ट ---

Thursday, October 21, 2010

क्यों

ये उदासी का आलम

जाता क्यों नहीं ,

तू मुझको फिर से

रुलाता क्यों नहीं.

कब तक सहूँ


तेरी ज़ुल्मतो के वही करम ,

तू मुझ पे कोई

नया सितम ढाता क्यों नहीं.

नम आँखों से मेरी

बहने लगें अश्क ,

तू मुझको

कभी इतना हंसाता क्यों नहीं.

जो हर रोज मैं

लाख जतन से छुपाता हूँ,

वो तुझको

कभी नज़र आता क्यों नहीं.

कितना भी हूँ

दूर तुमसे मैं लौट आऊंगा,

तू मुझको

शिद्द्त से कभी बुलाता क्यों नहीं

--सुदेश भट्ट---