हर तरफ धुआं-धुआं सुलगती हुई जिंदगी ,
अविशवास,संशय, छल,कपट की चादर में लिपटी हुई जिंदगी !
चीथडो में बेसुध दुधमुहे बच्चे की
भूख का वास्ता देती
शहर की सड़कों पे
आग उगलती दोपहरों में भटकती हुई जिंदगी !
नशे और जुर्म की दलदल में
अपने मासूम बचपन
और अपनों से बिछड़ी हुई जिंदगी !
कूडे के ढेर में
कुत्तों के साथ
बची खुची जूठन के लिए
लड़ती झगड़ती हुई जिंदगी !
जय जवान जय किसान
का नारा देने वाले देश में
कर्ज के बोझ से दम तोड़ती हुई जिंदगी !
मनुष्य के निज स्वार्थों से
शर्मशार
अपने आप में सिमटती हुई जिंदगी !
किसी के लिए नेमत
किसी के लिए बोझ
मनुष्य की ह्रदयहीनता पर हंसती हुई जिंदगी !
क्यूं सब के लिए एक सी नही
जिंदगी ये जिंदगी ??????????????
--सुदेश भट्ट---
Friday, March 5, 2010
सूत्रधार
मुझको मुस्कराने दो फूलों की तरह
मुझको गुनगुनाने दो भवरों की तरह
मुझको इठलाने दो तितलियों की तरह
मुझको बल खाने दो नदियों की तरह
मुझको उड़ जाने दो हवाओं की तरह
मुझको झिलमिलाने दो सितारों की तरह
मुझको पल्वित होने दो कुसुम लतावों की तरह
मुझको धरा पे आने दो बहारों की तरह
मैं ही माँ हूँ मैं ही बहन हूँ
मैं ही प्रियतमा भी हूँ
मै ज़िंदगी का आधार हूँ
आनेवाले कल की सूत्रधार हूँ
होने दो इस बसुन्धरा पे
मुझको भी साकार
न मुझ से छीनो मेरा ये हक़
मैं गर्भ मे ले रही आकार हूँ
----- सुदेश भट्ट -----
मुझको गुनगुनाने दो भवरों की तरह
मुझको इठलाने दो तितलियों की तरह
मुझको बल खाने दो नदियों की तरह
मुझको उड़ जाने दो हवाओं की तरह
मुझको झिलमिलाने दो सितारों की तरह
मुझको पल्वित होने दो कुसुम लतावों की तरह
मुझको धरा पे आने दो बहारों की तरह
मैं ही माँ हूँ मैं ही बहन हूँ
मैं ही प्रियतमा भी हूँ
मै ज़िंदगी का आधार हूँ
आनेवाले कल की सूत्रधार हूँ
होने दो इस बसुन्धरा पे
मुझको भी साकार
न मुझ से छीनो मेरा ये हक़
मैं गर्भ मे ले रही आकार हूँ
----- सुदेश भट्ट -----
कागज
अपने जज्बातों को कागज पे कलम से उकेरता हूँ
जो पल मै जी चुका हूँ उनको फ़िर से
अपने हाथों से समेटता हूँ
कोई अहसास कोई दर्द जब दिल मे चुभन पैदा करता है
उस जख्म को कुछ और कुरेदता हूँ
फ़िर उसके निशान कागज पे उकेरता हूँ
शब्दों के हेर फेर मे ख़ुद को उलझाता हूँ
बात इतनी सी है जो बात आज तक
ख़ुद नही समझा, ओरों को समझाता हूँ
ख्यालों के सागर मे शब्दों के तूफान उठाता हूँ
दिल जब खाली खाली लगता है
उसपे कुछ बार बार लिखता हूँ, मिटाता हूँ !
-----सुदेश भट्ट -------
जो पल मै जी चुका हूँ उनको फ़िर से
अपने हाथों से समेटता हूँ
कोई अहसास कोई दर्द जब दिल मे चुभन पैदा करता है
उस जख्म को कुछ और कुरेदता हूँ
फ़िर उसके निशान कागज पे उकेरता हूँ
शब्दों के हेर फेर मे ख़ुद को उलझाता हूँ
बात इतनी सी है जो बात आज तक
ख़ुद नही समझा, ओरों को समझाता हूँ
ख्यालों के सागर मे शब्दों के तूफान उठाता हूँ
दिल जब खाली खाली लगता है
उसपे कुछ बार बार लिखता हूँ, मिटाता हूँ !
-----सुदेश भट्ट -------
Thursday, November 19, 2009
नादान
कभी नादान रहा कभी अनजान रहा
कभी मसरूफ रहा कभी मगरूर रहा
कभी याद किया कभी भूल गया
कभी हँसता आया कभी रोता आया
कभी कुछ पा के आया
कभी सब कुछ खो के आया
कभी शुक्रिया कभी शिकवा करने आया
जब भी मैं तेरे दर पे आया
मैं ने ही कहा मैं ने ही सुना
तू मुझ मे ही छुपा था कहीं ऐ मेरे खुदा !
----- सुदेश भट्ट -----
कभी मसरूफ रहा कभी मगरूर रहा
कभी याद किया कभी भूल गया
कभी हँसता आया कभी रोता आया
कभी कुछ पा के आया
कभी सब कुछ खो के आया
कभी शुक्रिया कभी शिकवा करने आया
जब भी मैं तेरे दर पे आया
मैं ने ही कहा मैं ने ही सुना
तू मुझ मे ही छुपा था कहीं ऐ मेरे खुदा !
----- सुदेश भट्ट -----
कमी
रह रह कर रातों को सर्द हवा चलती रही
दिल पर परत दर परत दर्द की तह जमती रही
उससे जुदा हो कर केसे जिया क्या बताऊँ
दिल की धड़कन थमी रही साँस चलती रही
केसे ढ़ूढ़ता उसको इतने बड़े शहर में
वो जो मेरी तलाश में शहर बदलती रही
यूँ तो गुजर गई जिंदगी तन्हाईयों में
बस भीड़ में उसकी कमी खलती रही
सब कुछ भूल गया जब भी उसको याद किया
आँखों के पानी में बस
एक धुंधली सी तस्वीर बनती बिगड़ती रही !
--सुदेश भट्ट---
दिल पर परत दर परत दर्द की तह जमती रही
उससे जुदा हो कर केसे जिया क्या बताऊँ
दिल की धड़कन थमी रही साँस चलती रही
केसे ढ़ूढ़ता उसको इतने बड़े शहर में
वो जो मेरी तलाश में शहर बदलती रही
यूँ तो गुजर गई जिंदगी तन्हाईयों में
बस भीड़ में उसकी कमी खलती रही
सब कुछ भूल गया जब भी उसको याद किया
आँखों के पानी में बस
एक धुंधली सी तस्वीर बनती बिगड़ती रही !
--सुदेश भट्ट---
हिसाब
काँटों से भरी हर रहगुजर से वास्ता रखना
मंजिल तक पहुचना हो
तो कठिन अपने लिए रास्ता रखना
दोर ऐ गम गुजर जाएगा
वक्त हो मेहरबान तो भी खुदा से वास्ता रखना
वक्त हो बुरा तो दुश्मनों पे नज़र
दोस्तों से फासला रखना
झूट की बुनियाद पर
जब भी कोई रिश्ता रखना
सूखे हुए दरख्तों पे निगाह रखना
ना हो घर का माहोल खुशनुमा
तो घर की बातें घर में रखना
घर की दीवारों में हो दरारें
तो आवाज़ आहिस्ता रखना
नाज़ुक हो मिजाज़
तो जुबान पे काबू दिल में होंसला रखना
किसी और पे उंगली उठाने से पहले
अपने सामने
अपने गुनाहों का हिसाब रखना !
----- सुदेश भट्ट -----
Sunday, September 20, 2009
सबक
मन कभी कभी
विचलित हो जाता है,
अक्सर सोचता हूँ
जाने किस तरह कोई
किसी का मन
दुखा के खुशी पाता है
समझ नही पाया
क्यों मधुर वाणी को
काँटों सा कंटीला बनाया जाए
क्यों न
किसी का गम बाँट कर
रोते हुए को हंसाया जाए
जेसे चमचमाती हुई धुप
बिना नाप तोल
सब के लिए
जेसे सब के लिए
बूढे पीपल की छावं
जेसे अधखुली कलियाँ
महके सब के लिए
बिना भेदभाव
जेसे मखमली दूब
पावं तले
रोंदे जाने पर भी
गुदगुदाती सबके पाँव
क्यों न तेरा मेरा छोड़ के
सबको अपनाया जाए
छोड़ कर कडुवाहट और कठोरता
अपने ह्रदय को कोमल,
मधुर सर्वग्राही, सर्वहितकारी बनाया जाए !
--सुदेश भट्ट---
विचलित हो जाता है,
अक्सर सोचता हूँ
जाने किस तरह कोई
किसी का मन
दुखा के खुशी पाता है
समझ नही पाया
क्यों मधुर वाणी को
काँटों सा कंटीला बनाया जाए
क्यों न
किसी का गम बाँट कर
रोते हुए को हंसाया जाए
जेसे चमचमाती हुई धुप
बिना नाप तोल
सब के लिए
जेसे सब के लिए
बूढे पीपल की छावं
जेसे अधखुली कलियाँ
महके सब के लिए
बिना भेदभाव
जेसे मखमली दूब
पावं तले
रोंदे जाने पर भी
गुदगुदाती सबके पाँव
क्यों न तेरा मेरा छोड़ के
सबको अपनाया जाए
छोड़ कर कडुवाहट और कठोरता
अपने ह्रदय को कोमल,
मधुर सर्वग्राही, सर्वहितकारी बनाया जाए !
--सुदेश भट्ट---
Sunday, September 6, 2009
दिल खानाबदोस
मै जीया तो जीया
मगर अपने लिए कब जीया,
कभी उसकी जुल्फों मे
कभी उसकी आंखो मे
दिल के फरेबों मे खोया रहा!
कभी मुझको इसकी चाहत
कभी दिल को उस से राहत,
दिल खानाबदोस
जाने किस किस की गली मे भटका किया !
----- सुदेश भट्ट -----
मगर अपने लिए कब जीया,
कभी उसकी जुल्फों मे
कभी उसकी आंखो मे
दिल के फरेबों मे खोया रहा!
कभी मुझको इसकी चाहत
कभी दिल को उस से राहत,
दिल खानाबदोस
जाने किस किस की गली मे भटका किया !
----- सुदेश भट्ट -----
सोच
उसकी आंखो की हरकत
उसके चेहरे की शिकन से
उसकी सोच को पढता रहता हूँ ,
दुनिया से मोहब्बत से पेश आऊं
इसलिए अपने आप से लड़ता रहता हूँ!
इतनी बड़ी दुनिया में किस - किस का
मिजाज़ बदलता,
इसलिए रोज़
नए सांचे में ढलता रहता हूँ !
मेरे दुश्मनों को कोई आंच ना आए
यही सोच कर रोज़,
अपना बयान बदलता रहता हूँ !
----- सुदेश भट्ट -----
उसके चेहरे की शिकन से
उसकी सोच को पढता रहता हूँ ,
दुनिया से मोहब्बत से पेश आऊं
इसलिए अपने आप से लड़ता रहता हूँ!
इतनी बड़ी दुनिया में किस - किस का
मिजाज़ बदलता,
इसलिए रोज़
नए सांचे में ढलता रहता हूँ !
मेरे दुश्मनों को कोई आंच ना आए
यही सोच कर रोज़,
अपना बयान बदलता रहता हूँ !
----- सुदेश भट्ट -----
रिश्ते
तेरे मेरे इस रिश्ते में
शब्द अधूरे लगते है
जो तुम सुनती हो जो मैं कहता हूँ
वो अर्थ अधूरे लगते है!
अब के जो बिछड़े तो शायद
मिलना नामुमकिन हो,
यू तो सारी उम्र भी लोग
मिलते और बिछड़ते है!
चाहे कितना भी सहेज के रखो किताबो में,
वक़्त से पहले डाली से जो टूटे
वो फूल कहाँ फिर खिलते है!
जिनसे प्यार हो,
उनसे रोज कहो,उनसे रोज मिलो,
ऐसे मेहरबां रोज़ कहाँ ,
ज़िन्दगी में फिर मिलते है !
-----सुदेश भट्ट -------
शब्द अधूरे लगते है
जो तुम सुनती हो जो मैं कहता हूँ
वो अर्थ अधूरे लगते है!
अब के जो बिछड़े तो शायद
मिलना नामुमकिन हो,
यू तो सारी उम्र भी लोग
मिलते और बिछड़ते है!
चाहे कितना भी सहेज के रखो किताबो में,
वक़्त से पहले डाली से जो टूटे
वो फूल कहाँ फिर खिलते है!
जिनसे प्यार हो,
उनसे रोज कहो,उनसे रोज मिलो,
ऐसे मेहरबां रोज़ कहाँ ,
ज़िन्दगी में फिर मिलते है !
-----सुदेश भट्ट -------
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